पकवानों की थाल में

मैं ही रंग जमाती हूं

हो कोई भी उम्र

सबके मन को लुभाती हूं


ज़ुबान के मिजाज़ पर

शीरी का वरक़ चढ़ाती हूं

बेरंग से जज़्बातों को

केसरिया कर जाती हूं


टेढ़ी हूं मैं मगर 

रस टपकाती हूं

फीकी सी ज़िंदगी में 

मिठास भर जाती हूं


मैं हूं "जलेबी "

ज़िंदगी का पाठ पढ़ाती हूं

मीठी भी हो सकती हैं उलझने

यही मैं सिखाती हूं...

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