तोड़ती हैं दम जब हसरतें तमाम
हकीकतों की दहलीज़ पर
वास्तविकता के हाथों
ख्वाबों का तमाशा हर रोज़ होता है
छूटता है पीछे जब तमन्नाओं का शहर
तो अश्कों के बहाव में इज़ाफा होता है
छेड़ती है ज़िंदगी जब गम के तराने
कश्मकश की दहलीज़ पर
चैन ओ सुकून टूट कर चकनाचूर होता है
छूटता है पीछे जब इत्मीनान का शहर
तो बेचैनियों के उत्पाद में इज़ाफा होता है
बिखरती है उम्मीदें जब
इंतज़ार की दहलीज़ पर
हौसलों का घरौंदा बिखर कर भग्न होता है
छूटता है पीछे जब हिम्मतों का शहर
तो विफलता के विस्तार में इज़ाफा होता है
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