गिरूं जब जब

झट से संभाल ले

फँसू जो कभी तो

झट से वो निकाल ले


बैंठूं जो उदास तो

खुशियों से सँवार दे

दिखूँ जो निराश तो

व्याकुलता से उभार दे


रोऊं जो कभी

तो हँसी से निखार दे

करूं जो शिकायत तो

सबकुछ अपना वार दे


ऐसा हो हम-नवा

जो कर के देह को परे

आत्मा को सँवार दे

आत्मा को सँवार दे

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