होता जो गठबंधन जज़्बातों से जज़्बातों का
तो इक दूजे के एहसासों का
आधार बन जाता
आ जाता जो कभी दुख का अंधकार तो
खुशियों की कतार बन जाता
होता जो गठबंधन नज़रों से नज़रों का
तो इक दूजे की खामोशियों का
तलबगार बन जाता
आती जो नमी कभी आंखों में
तो लफ़्ज़ों की ढाल बन जाता
होता जो गठबंधन दिलों का दिलों से
तो इक दूजे की धड़कनों का
आधार बन जाता
आती जो कभी दर्द की बाढ़ ज़िंदगी में
तो सुकून की पतवार बन जाता
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