नज़रों में ख्वाहिशें थी

और अश्क बिक रहे थे

चेहरों पर तो मुस्कुराहटें सजी थी

फ़िर भी सहमें सहमें से

सारे शख़्स दिख रहे थे....


महफिलें हसरतों की लगी थीं

बर्बादियों के अफसाने बिक रहे थे

हुस्न के रंगों से रोशन थी कायनात

फ़िर भी इश्क़ के बाज़ार में

आज सब नम दिख रहे थे...


लफ़्ज़ों का जमावड़ा था

जज़्बातों के रूप सज रहे थे

एहसासों की गूंज थी चारों ओर

फ़िर भी ग़ज़लों के दरबार में

आज अल्फ़ाज़ कम दिख रहे थे..

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