थे वो भी क्या दिन
जब हम रोज़ मिलते थे
देखते ही एक दूसरे को
हम सबके चेहरे खिलते थे
होता था जो भी ग़म
वो सब आपस में बांट लेते थे
वो भी क्या दिन थे जब
उदासियों के बीच से हम
मुस्कुराहटें छांट लेते थे
आती थी जो कोई विपदा
तो यारों का हुजूम साथ होता था
वो भी क्या दिन थे जब
काँधों पर हमेशा निश्चिंतता
का हाथ होता था
बेचैनियों के साए में भी
हरपल सुकून का
एहसास होता था
वो भी क्या दिन थे जब
दोस्तों का समूह हरदम
आस पास होता था
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