दर्द का कोई खरीदार नहीं मिलता
जो समझ सके अनकहे भावों को ऐसा
मुनासिब समझदार नहीं मिलता
बेचैनियों को रखकर गिरवी
सुकून उधार नहीं मिलता
जो रख सके जज़्बातों को
दिल में छुपाकर
ऐसा मुनासिब राज़दार नहीं मिलता
छलावों का दौर है ये साहब
यहां ढूंढने पर एक भी
ईमानदार नहीं मिलता
बात हो खुशियों की
तो लग जाता है मेला
मगर जो बात हो उदासियों की
तो एक भी मुनासिब
लेनदार नहीं मिलता
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