छलकते दर्द को
लबों से बताऊं कैसे
उठती हुई टीस को
नज़रों से दिखाऊं कैसे
मन है व्यथित
ये तन को समझाऊं कैसे
जज़्बातों की उफनती लहरों को
दिल के गहरे समुंदर में छुपाऊं कैसे
दिमाग़ में उठते सवालों को
हृदय के भावों से सुलझाऊँ कैसे
जब तन्हा ही गुज़रना है
ज़िंदगी का सफ़र
तो यथार्थ को छोड़
भ्रम को अपनाऊं कैसे
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