बैठी जो आज फुरसत से
तो यादों का दरीचा खुल गया
चली जो कुछ क़दम
ख्यालों की चौखट तक तो
एहसासों का बगीचा खिल गया
गुज़री जो पल भर को
बंद आँखों की गलियों से
तो अतीत का नज़ारा मिल गया
बिताए जो कुछ लम्हें ख़ुद के साथ
तो खामोशियों को लफ़्ज़ों
का सहारा मिल गया
आई जो वापस लौट कर
हकीकतों की दुनिया में तो
भागती हुई सी ज़िंदगी को
सुकून का ठहराव मिल गया
रहते थे अब तक जो क़दम
ख्वाहिशों के रुके रुके से
उन्हें ऊंची उड़ान का परवान मिल गया
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दरीचा(खिड़की)


