बैठे बैठे अक्सर मैं गुम हो जाती हूं
इस दुनिया से परे कहीं दूर चली जाती हूं
ना हँसती हूं ना रोती हूं बस हरदम बुदबुदाती हूं
यादों की गहराईयों में बस डूबी चली जाती हूं
ना ख़बर रहती है दिन की
ना रातों का होता है कोई ठिकाना
मगर फिर भी लगता है
ये मंज़र कुछ जाना पहचाना
ख्वाहिशों का रोना और
हकीकतों का चुप कराना
यहां हर कोई फिरता है ख़ुद से होकर बेगाना
पहुंची जो नज़दीक थोड़ा तब मैंने जाना
होता है ऐसा ही ज़िंदगी का अदना सा फसाना
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अदना(तुच्छ)
