अब वो चैन ओ सुकून के ज़माने ना रहे
बिस्तर तो ख़रीद लिए मखमली
मगर अब नींदों के ठिकाने ना रहे
ऐश ओ आराम कमाने की चाहत में
अब वो याराने ना रहे
पैसा तो बहुत कमा लिया मगर
अब वो खुशियों के ख़ज़ाने ना रहे
मुक़ाम तो हासिल कर लिए बहुत
मगर ज़िंदगी के अब वो फ़साने ना रहे
बैगानों के हुजूम तो
इकट्ठा कर लिए बहुत
मगर अब वो चंद
अपनों के नज़राने ना रहे
मगर अब वो चंद
अपनों के नज़राने ना रहे
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