
हर शाम गुज़ारा करना चाहे...
हर शाम नज़ारा बनना चाहे...
यह साँसें है हैरानी सी
कुछ रुकना चाहें कुछ चलना चाहे
हर बार जमाना कहता है
बस इस बार जमाना सुनना चाहे
ये धड़कन हैं जज्बातों की
हर बार किसी को पाना चाहे
कुछ लम्हें हैं कुछ रातें बाकी
हर ख़्वाब हक़ीक़त होना चाहे
मौत को पढ़कर जीना चाहे
हर दिन को खोकर मरना चाहे
इंसान लतीफ़े सुन कर भी कुछ रोना च
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