हर शाम गुज़ारा करना चाहे...
हर शाम नज़ारा बनना चाहे...
यह साँसें है हैरानी सी
कुछ रुकना चाहें कुछ चलना चाहे
हर बार जमाना कहता है
बस इस बार जमाना सुनना चाहे
ये धड़कन हैं जज्बातों की
हर बार किसी को पाना चाहे
कुछ लम्हें हैं कुछ रातें बाकी
हर ख़्वाब हक़ीक़त होना चाहे
मौत को पढ़कर जीना चाहे
हर दिन को खोकर मरना चाहे
इंसान लतीफ़े सुन कर भी कुछ रोना चाहे
कुछ हँसना चाहे
ये रीति है इस दुनिया की,
कुछ रहना चाहे कुछ मिटना चाहे
ये ज़ात है मेरी नदियाँ की,
कुछ पीना चाहे कुछ बहना चाहे
ये ज़िन्दगी की रस्में है
बस कुछ जीना चाहे कुछ मरना चाहे
सब मूरत है इस मिट्टी की कुछ जलना चाहे
कुछ गढ़ना चाहे
ये रातें है विरहा की कुछ सोना चाहे
कुछ जगना चाहे
हर कहानी कविता सी है
कुछ लिखना चाहे कुछ पड़ना चाहे...