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खता


नाजाने कहाँ है मेरी मंजिल ,अक्सर रोज पता पूछते हैं:– लोग ,

मैं खुद हैरान हूँ:- आखिर जाना कहाँ है ,मेरे दर-बदर भटकने की खता पूछते हैं:– लोग ,

— रोहित के.डी.
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