आओ सुनाता हूँ पिछले एक महीने की दास्तान,

जिससे गुज़रा है भारत का हर इंसान


बहुत क्रूर बनकर आई महामारी की दूसरी लहर

चंद दिनों में फैल गई वो गाँव गाँव शहर शहर,


अस्पतालों में बेड भर गए शमशानों में लग गई कतार

मुफ्त में मिलने वाली हवा के लिए मच गया हाहाकार,


हर फ़ोन की घंटी के साथ दिल हो जाता था भारी

जाने किसका फ़ोन है किसकी आ गई है बारी,


इंसानियत भी देखी जहाँ अपना बेड तक दे दिया,

हैवानियत भी देखी जहाँ अपना ज़मीर भी बेच दिया


पैसे वालो का पैसा धरा रह गया गरीब हमेशा की तरह सड़को पर पड़ा रह गया,

मौत का तांडव था ऐसा जो जहाँ था वहाँ का वहाँ खड़ा रह गया


बेशक आज संक्रमण कम है पर मौतों का जारी है दौर

कुछ दिन की और बात है यारो जल्द बोलेंगे हम सब मिलकर कोरोना इस नो मोर..