एक रेल ठहरी है जंगल में
लोहे के कठोर डिब्बों को
झाड़ियों के पत्ते छू गई है
नींद से जागती है रेल
दौड़ती है स्टेशन की ओर
उस जंक्शन पर मेरा कोई नहीं है
कोई आने वाला भी नहीं
मैं डब्बे से उतरता हूँ
खेल रहे हैं प्लेटफॉर्म पर बच्चे
खेलते हुए हँसते हैं
हँसते हुए खेल रहे हैं
मैं उनकी परिक्रमा करता हूँ
कोई बच्चा
मुर्छित और उदास
पड़े दिन की ओर उछाल देता है
हँसी का एक मुलायम टुकड़ा
रोहित ठाकुर


