कहते हैं वे बंधे हैं जंजीरों में

जरूर कुछ अच्छा नही लिखा हैं उनकी तकदीरों में।

वो देखते हैं उनको जो आजाद हैं पंछी की तरह खुले गगन में ।

रहते है जो अपनी मस्त मग्न धुन में ।

उन्हें देखकर वो बुनने लगते हैं ख्वाब काश हम भी होते उन जैसे जनाब ।

कोसते हैं वो अपनी तकदीर

क्यों बना दिया उन्हें ऐसा फकीर।

पर हर आजाद दिखने वाले पंछी आज़ाद होकर भी आजाद नही होता ।

ना जाने कितनी सताती हैं उधेड़ बुन मन की ।

फिर चिंता भी छोड़ देता हैं वो तन की।

चाह कर भी वो नही बता पाता वो अपने मन की।

चारो तरफ हैं उसके अपनो का साया ।

लेकिन फिर भी लगता हैं उसे ये सब पराया ।

कैसे कुछ वो बताए जब पहले से ही उसे आभास

उसकी इन बातो से नही मिलेगा उसे कुछ खास ।

इसलिए दफन ही कर देता हैं वो इन बातों को वो जनाब । और छिपाकर सब कुछ लगा कर चेहरे पे खुशी का नकाब ।

भरता हैं वो पंछी अपनी दिखावे की उड़ान ।