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लम्हा लम्हा ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से साल, महीने, सप्ताह नदारद हैं... मन घड़ी-घड़ी, पल-पल में जीता है... लेकिन उन्हें जोड़ के भी कोई तारीख़ पूरी नहीं होती याद नहीं कब एक लम्हें के लिए भी दिल को तन्हाइयों का साथ हुआ हो ज़िन्दगी मुस्ससल दौड़ रही है रफ़्तार के साथ कभी रिक्शा, कभी ऑटो और कभी दो कदमों के सहारे ही खोजती है अपनी मौजूदगी कॉफ़ी में बने दिल की तरह दिल का मौसम भी एक गर्माहट
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