ज़िन्दगी से साल, महीने, सप्ताह नदारद हैं...
मन घड़ी-घड़ी, पल-पल में जीता है...
लेकिन उन्हें जोड़ के भी
कोई तारीख़ पूरी नहीं होती
याद नहीं कब एक लम्हें के लिए भी
दिल को तन्हाइयों का साथ हुआ हो
ज़िन्दगी मुस्ससल दौड़ रही है
रफ़्तार के साथ
कभी रिक्शा, कभी ऑटो
और कभी दो कदमों के सहारे ही
खोजती है अपनी मौजूदगी
कॉफ़ी में बने दिल की तरह
दिल का मौसम भी
एक गर्माहट तलाश रहा है
ठंडी पड़ी हथेलियों में
गर्म कॉफ़ी का मग लिए
इंतज़ार में है एक सुकून के
और हां, सुकून भी चाहिए उसको
सिर्फ कुछ लम्हों का
इतना कि ज़िन्दगी केवल झाग ना लगे
बल्कि जिये हुए वो पूरे साल महीने सप्ताह लगे
जिसका स्वाद, जिसका अरोमा, जिसकी तासीर
दिल, ज़ुबाँ और एहसासों में इस तरह घुला हो
कि कोई मौसम अजनबी ना लगे
कोई कहानी अधूरी ना लगे
कोई शहर अनजाना ना लगे