साँसे टूट रहीं है साथी छूट रहे है

भगवान ना जाने क्यों रूठ गए है 

दुनिया की हिल गई है बुनियादें

ग़ुरूर इंसानों के गिरके टूट रहे है 

बेवजह मर रहे है लाखों बेगुनाह 

साँसो के मोल चुकाने पड़ रहे है 

ना दवा काम आ रही है ना दुआ 

मौत का क़हर बन गईं है अब हवा 

चमत्कार ही कोई सकता है बचा 

हे प्रभु अब तू ही कोई रास्ता दिखा 

नैया जीवन की हमारी पार लगा 

~ राकेश की क़लम से

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामया,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद् दुख भागभवेत।

ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः”