ख़ौफ़

यह ख़ौफ़ की आहट है 

या मौत का सन्नाटा है 

यह साँसों की है बेबसी 

या दर्द यूँ ही चिल्लाता है 

कैसे देखूँ तबाही का मंजर 

रह रह कर दिल भर आता है 


चुनौती दी है एक शैतान ने 

जो नज़र भी नहीं आता है 

जिंदा रहता है वही शख़्स 

जो मुँह अपना छुपाता है 


रास्ता रोके खड़ी है मौत

नहीं कोई घर से बाहर निकल पाता है 

मिलना तो दूर इंसान एक दूसरे से हाथ 

भी नहीं मिला पाता है 


सॉंसो की है यहाँ तिजारत और 

हर शह बाज़ार से है निदारत 

इंसान साँस लेने को तरस जाता है 

कांधा ढूँढने से भी नहीं मिल पाता है 


ना जाने क्यों है ख़ुदा इतना ख़फ़ा 

किस गुनाह की दे रहा है हमको सजा 

हर रोज़ मर रहें हैं हज़ारों बेगुनाह 

शिकस्त दे रहीं हैं ज़िंदगी को क़ज़ा 


अब रास्ता नहीं है कोई और बचा

सिर्फ़ तेरी रहमत का है एक आसरा 

रोशनी अंधेरों को तू फिर से दिखा

ख़त्म आज़माइशों का कर सिलसिला


राकेश की कलम से 

@RakeshMalhotra