गुजर गया 2020

राकेश की कलम से


बदल कर दुनिया

आखिर रुख़्सत हुआ

दर्द का सफ़र

दवा पर आकर थम गया

पीछे छोड़ गया

सहमें हुए शहरों के वीराने

दफ़न ना जाने कितने मासूमों की जिंदगी कर गया


जो कभी ख्वाब मे भी

न सोचा था किसी ने

महामारी ऐसी

दुनिया भर में फैला गया

क़हर बनके आया था

बुनियादें दरों दीवार की हिला गया

मोल दौलत का बराबर

सिफ़र के बता गया  

कीमत साँसों की कोहिनूर

से भी ज्यादा बता गया


ताले चाहें दरवाजों पर

इबादतगाहों के लगा गया

मगर उसकी रहमत पर  

अक़ीदा मज़बूत करा गया

वक़्त पर एक दूसरे के काम

आना ही इंसानियत है

सबक यह सीधा सादा सा

पूरी दुनिया को सिखा गया


एक ज़लज़ला था वोआखिर गुजर गया

बहा के अपने साथ

खुदगर्जी को ले गया

इंसान को चाहे

एक दुसरे से दूर कर गया

मगर मज़बूतइंसानियत की जड़े कर गया

माजी है अब वो

वक़्त के साथखुद ही मिट जायेगा

मिलकर हम सब

लिखें फलसफा एक नया     

शुक्र दिन रात

उस की रहमत का करें

एकजुट होकर

दुनिया को

हम बेहतर करें


दशक के आगाज़ पर

ये ठान लेते है

झांक कर अंतर्मन मे

पहले खुद को जान लेते है

दीन-दुखियों की मदद करना

कर्म अपना मान लेते है

सेवा ही धर्म है बात यह

पल्ले से अपने बांध लेते है