एक दुआ

सुबह शाम साँसों को ढूंढ रहे हैं

घरौंदे हौसलों के अब टूट रहें है

हर दिन साथ अपनों के छूट रहे है

धीरे-धीरे सारे सपने टूट रहे है


दर्द अब और नहीं सहा जाता

वेदना के बाँध सारे टूट गए है

ईश्वर क्यों हम से रूठ गए है 

क्या हम इंसानियत भूल गए है 


ऐ खुदा अब और ना हमको आज़मा

माफ़ करदे हमारे गुनाहों की सजा

क़बूल कर ले हमारी बस इक दुआ 

नेकी ही धर्म हो ये सबको समझा

रास्ता इंसानियत का हमको दिखा

सुख और सुकून से ज़िंदगी को महका


एक उम्मीद है जो अब भी है बाक़ी

हम सब तेरी रहमत को ढूँढ रहे है

कल आज से यकीनन होगा बेहतर

लाखों हाथ दुआ के लिए उठ रहे हैं


@Rakesh Malhotra

राकेश की कलम से ✍