कंधों पर हमारे चढ़ कर

आस्माँ जिन्होंने सर पर उठा रखे थे

अदाकार वो निकले शैतान

मुखौटे उन्होंने खुदा के लगा रखे थे

अपनी बेपनाह मोहबत से  

हमने खुदा जो हजारों बना रखे थे   

ख़ुदग़र्ज़ी के नशे मे चूर वो हैवान

जहर दुनिया को खिला रहे थे

धृतराष्ट्र बने बैठे रहे महानायक

बांध कर आँखों पर अपनी पट्टी

उनकी नाक के नीचे दुशासन

मुस्तक़बिल बच्चों का जला रहे थे


राकेश की कलम से~

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