हम को यहाँ पूछेगा कौन,

खोए हुए हैं खुद ही में लोग

मसरूफियत के दौर में

दो घड़ी ढूँढ कर लाएगा कौन

 

चेहरों के पीछे छुप गए हैं चेहरे

पहचानें कैसे जाएँगे लोग

धुंधला गए है आईने तमाम,

शक़्ल ढूँढ कर लाएगा कौन 


दर्द का बह रहा है दरिया यहाँ

और मुस्कुरा रहे हैं लोग

ज़ख़्म दिखाने की नहीं है इजाज़त

मर्ज यहाँ बतलाएगा कौन

 

रेत के शहर में बारिशों की

ख्वाहिश कर रहे हैं कुछ लोग

बुनियादें कागज़ी हो

तो रिश्तों की इमारत बनाएगा कौन 


राकेश की कलम से

@RakeshMalhotra