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छाँव


छांव थी हल्कीधूप सुनहरी,सपनों में लिपटीएक दोपहरीथामे हाथघुमाया प्रेम सेचल पड़े वोगीत के जैसेझील किनारेमुस्कान बसी थी,हर चाल में कुछरूमानी सी थीना कोई शब्दना कोई कसम,बस पल में बसी थीपूरी जीवन रस्म।

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