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दोहे: राष्‍ट्र धर्म

राष्ट्रद्रोह के ज्वर से, दहक रहा है देश ।

सुख खोजे निज धर्म में, राष्ट्र धर्म में क्लेश ।।


अभिव्यक्ति के नाम पर, राष्ट्रद्रोह क्यों मान्य ।

सहिष्णुता छल सा लगे, मौन रहे गणमान्य ।।


तुला धर्मनिरपेक्ष का, भेद करे ना धर्म ।

अ, ब, स, द केवल वर्ण है, शब्द भाव का कर्म ।।


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