ठोकर लगी तो थी किंतु, लगने का एहसास न हुआ वो प्यारी-सी मुस्कान मानों मेरी रक्षक थी। मदद थी या जीत थी वो मेरी पहचान न पाया मैं ईश्वर की उपस्तिथि की पहचान थी शायद। सहारा मिल गया था आगे बढ़े जा रहा था मैं हृदय में मगर वही प्यारी मुस्कान थी विषय नहीं था अब चिंता का भय की कोई बात न थी दुःख तो सिर्फ़ इतना ही था मंज़िल तो थी पर.. वो प्यारी मुस्कान न थी।