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सोचूं तुम्हें


सोचूं तुम्हें तो रूह महकने लगती हैदेखूं तुम्हें तो आंखें धड़कने लगती है

कौन हो तुम, क्या हो तुम मेरेबस यही सोच के ज़िंदगी गुनगुनाने लगती है।।

— रितु राज
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