ये सफर भी कितना मदहोश सा है
इन राहों पर दर्द भी हैं, चुभन भी, अकेलापन भी है
लेकिन वो मंजिल भी अजीब सी जिद्दी है ना
इसे पाने की चाह में ,ये सुनसान रास्ते भी अपने से लगने लगे हैं
जहां मेरी सतत संघर्ष का साक्षी ये प्रकृति बन बैठा है
देखो ना,
मेरी ख़्वाब की तरह ऊंचे-ऊंचे ये पेड़
मुझे चट्टान से दृढ़ बनाने ये पहाड़
मुझमें काम करने की नित नई उमंग भरते सूरज की ये किरणें
मुझे शीतलता का पाठ पढ़ाते ये मोतियों की चादर ओढ़े ओस की बूंदे
सफलताओं की महक में डुबोते फूलों की हसीं वादियां
मेरे चंचल मन में प्राण भरते हवाओं के ये झोकें
मेरी कल्पनाओं को सराबोर करती ये बारिश की बूंदें
ये आसमान, ये चांद,ये सितारे, ये प्रकृति संघर्ष के इस सफर में मेरे हमसफ़र बन बैठे हैं
खुदा की रहमत का नूर लिए
लबों पर हसीं का जाम लिए
आखों में तैरते एक निष्ठ ख़्वाब लिए
मंजिलों को एक ना एक दिन पाने का अदम्य उत्साह लिए
संघर्ष पथ पर अडिग अप्रतिहत गति से बढ़ते मेरे कदम
उम्र भर, उम्र भर, उम्र भर
रितु राज


