चाय की हर घूंट पर
हर दफा मेरी नजरों को तेरा इंतज़ार रहता है
जब भी ये प्याली मेरे हाथ में होती है
मैं कहीं शून्य में होती हूं
हां, तेरे बगैर चाय की चुस्की में क्या आनंद है
आखिर तुम्हीं ने तो इस चाय की लत मुझे लगाई
अनायास मेरी आंखें
अपनी बगल वाली कुर्सी को अपलक निहारती है
शायद तुम कहीं से भी आ जाओ और
फिर वही राग अलापने लग जाओ
मुझे ना तुमसे ज्यादा तुम्हारी चाय से इश्क़ है और
मैं कहूं सुनो कल से खुद ही चाय बना लेना
इतने ख़्वाबों के बीच
मेरी चाय की प्याली हाथ से अक्सर छूट जाती है
बिल्कुल तुम्हारी तरह
जैसे तुम मेरी लम्हों से छूटकर इतनी दूर चले गए
और मैं तुम्हें अपनी बाहों में हमेशा के लिए कैद नहीं कर पाई
-रितु राज


