एक वक्त था जब मैं घंटों आईने मे निहारा करती, जिन्दगी में अपने किसी के आने की राह ताका करती। हर पल सपनों का एक नया महल खड़ा किया करती, कभी उसको बनाती कभी खुद ही ढा दिया करती। मन -सागर मे ज्वार सदैव आया रहता, एक मीठा- सा खुमार छाया रहता । चुपके से एक दिन पल  वो आ ही गया, जिन्दगी को मेरी मंजिल बता ही गया। आईना अब भी देखती हूँ लेकिन एक जरूरत तक, राहें अब भी ताकती हूँ लेकिन सबके घर  लौट आने तक। अब कुछ ऐसा है मेरी जिन्दगी मे पंझी जैसे लौट आता है शाम को नीड़ में।