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गुम अँधेरों से उभरती वीरांगना



चंचल पवन सी वो सबके दिलों को छू जाती

अपनी बेबाकी से हर पल को रोशन कर देती,

कुछ तो कशिश थी उसकी आवाज में जो मोह लेती मन,

पर ना जाने क्यों वो फूलों सी महकती मनमोहिनी कहीं खो गई

जो मनमौजी होकर बिन कहे हर सफर तय कर लेती

पर आज क्यों वो चलकदमी उसकी डगमगा सी गई

यूँ तो उसके फन के कद्रदान बहुतेरे थे, पर आज वो क्यों खुद में सिमट गई

मुरझाई सी बेसुध वो खुद को कैद कर लेती,

दुनिया की चहलपहल से दूर उसकी तन्हाई की दुनिया सी बन गई

वक्त भी क्या अजीब था, जो सबके लिए हर पल साथ

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