देखता ही रहूं तुझे

सोचता रहूं

हरपल महसूस करू तुझे

सर्दी के मौसम में

तुम्हारे नजदीक आकर

अपने होंठ से आने वाली

वो गर्म सांसे तुम्हारी गर्दन पर

बिछा लाऊ

कानों से तेरी वो खुली जुल्फें हटाकर

यू तेरे सासो में समा जाऊं

पता ही ना चले

तेरी कमर को कब मेरे हाथो ने

कैद कर लिया है

और इतने में

मेरे हाथो की उंगलियां

तेरे हाथो की उंगलियों से

गुफ़्तगू करने लगे

मेरी आंखें, तुम्हारी आखों में

मेरी आंखों की

वो तड़प देखे

जैसे कबूतरों के

पंखों से धुन सुनाई दे

हो चारो और सन्नाटा सा

और बीच में तेरे पायलों की

वो दबी हुई सी खन खन गूंजे

माहौल यू बनता ही रहे

हरपल ख्वाब बुनता ही रहे

और सुनहरी धूप के साथ

आंगन में आई

सुबह का पता भी ना चले!


- रितेश