"बरसात"
क्यों फिर से चली आई तेरी याद,
आज सुबह की पहली बरसात के बाद
भुला दिया था बेख्याली को जब इस दिल ने,
टूटे ख़्वाबों को दफनाया था उन लम्हात,
सोचा नहीं था एक अर्से से जब मैंने,
अनजाने मोड़ पर आज हुई तुझसे मुलाक़ात
क्यों फिर से चली आई तेरी याद,
आज सुबह की पहली बरसात के बाद
कितनी यादें हैं तेरी मेरे दरमियां,
ख़ामोशी में जब करी हमने आख़िरी बात,
मेहसूस करके तेरी हथेलियों की नरमियां,
मेरे अश्कों से ज्यादा भीगी थी वो रात
क्यों फिर से चली आई तेरी याद,
आज सुबह की पहली बरसात के बाद
बरसात की बूंदों से धुलकर भी,
क्या बदला है कभी समन्दर का स्वाद,
मिल जाए फिर भी तेरी हर मौजों को साहिल,
दिल से मेरे निकली सदा यह फरियाद
क्यों फिर से चली आई तेरी याद,
आज सुबह की पहली बरसात के बाद
कुछ नहीं है, फिर हैं क्यों यह जज़्बात,
गर कुछ था तो क्यों छूटा अपना साथ,
जब ना इश्क था संगीन ना वह हालात,
अब मुद्दत से ना है शिकवा ना कोई दर्खास्त
क्यों फिर से चली आई तेरी याद,
आज सुबह की पहली बरसात के बाद
