नफर्मानियों के सबब तो हर फरमान अब बदल गया है भेजा गया था तुझे वो हर पैगाम अब बदल गया है कहाँ थी मंज़िल कोई सब राहगुज़र ही तो थी मिला था उस रोज़ जो मक़ाम अब बदल गया है हर एक शख़्स के साथ बस ताल्लुकात मतलबी हैं बेमतलाबी हुआ करता था वो इंसान अब बदल गया है शहर के हर बाज़ार में तो मिलती है बस बेईमानी हुआ करता था लोगों में जो ईमान अब बदल गया है नाकामी-ए-इश्क़ में तो बस फैली थी बेरोज़गारी जो था शख़्स कभी नाकाम अब बदल गया है क्या मौत हुई हालातों की बची है फ़क़त बदगुमानी ज़िया करते थे लेकर हम जो गुमाँ अब बदल गया है बेवफाई-ए-इश्क़ में तो थी सज़ा-ए-निदामत पर था मोहब्बत में बेवफाई का अंजाम अब बदल गया है था उसके मिज़ाज़ में तो रहना हालात-ए-बेखबर में हुआ करता था कभी शख्स जो अंजान अब बदल गया है निकला था "रितेश" घर से ख़्वाबों की जुस्तजू में लौटकर देखा तो तेरा वो मकान अब बदल गया है ।।