"मनीप्लांट"
टंगी हुई हूँ मैं
तुम्हारे मन की दीवार पर
हमारे रिश्ते के बेहद खूबसूरत हैंगिंग पोट में,
मनीप्लांट की तरह,
जिस पर गाहे-बगाहे पड़ती है तुम्हारी नज़र तो
'काफ़ी दिन हो गए' यह सोचते हुए
तुम इस हैंगिंग पोट का पानी बदल देते हो
और ऊपरी मन से कहते हो
'हमारा साथ जीवनभर का है।'
इस कथन की खोखली सच्चाई को मुस्कुराते देख
मैं सोचती हूँ ...
'काश ! मैं तुम्हारे मन की ज़मीन पर
पेड़ की तरह उगती।'
बिल्कुल वैसे ही जैसे
एक पत्नी चाहती है अपने पति की प्रेयसी होना
और प्रेयसी चाहती है अपने प्रेमी की पत्नी हो जाना
मैं चाहती हूं...
तुम्हारे मन की ज़मीन पर घना दरख़्त होना।
- रीता जाँगिड़


