‘आसां नहीं यूँ ही किसी का लड़की हो जाना' चींखती वो जब , सुना है शोर से उसके खुदा बैठा जहां भी हो, काँपता जरूर होगा। सींचती है अश्क़ उसके दर्द को जब जब, उफानें दूर कहीं सागर में लहरें रोज लेती हैं। होती दफ़्न वो जब-जब अपने वजूद में आने से पहले, हार कर मौत से, 'ज़िन्दगी'- लिपट कर क़फ़न में मिट्टी होती जरूर होगी। आसां नहीं यूँ ही किसी का लड़की हो जाना।। वो जब भूखी नज़रें, पड़ती जिस्म पर उसके, खरोंचे वासना की, लिहाज के उन लिबासों को भी चीर देती है। और फिर कुछ महापुरुषों के मुख से निकलती वो निर्वस्त्र शब्दें, जो इन सबके लिए उन लिबासों को दोष देते हैं, की इन महापुरुषों का अक्सर जिक्र मिलता है, अखबारों के उन हैडलाइनों में, जहां खुद की ही इज़्ज़त, खुद के हाथों नीलाम करते हैं। की फिर वाक्या होता है, कुछ दिल्ली-बैंगलोर जैसा, की फिर मर्दानियत के नाम पर 'हैवानियत' का नंगा नाच होता है, की फिर मोमबत्तियों से सड़के जगमगाती हैं, की फिर नारें लगते हैं, की फिरसे शोर होता है की फिर ज्यों ही शाम होती हैं, न फिर कभी भोर होती है। 'वो' पिछे छूठ जाती है, और पीछे छूठ जाते हैं, वही आँसू, वही चीखें और कुछ बची-कूची जलती मोमबत्तियों के संग, वही वादें, वही कसमें। और इन सब के बावजूद वो फिर भी, जीने की कोशिश तो करती है, मगर फिर सामने आता है समाज का वही छिपा चहरा, वही बातें, वही ताने और फिरसे वही आँसू, वही चीखें और फिर आखिर में सहारा बनता है, वही दुपट्टा, जो शायद लाज बचाने के लिए डाला था, आज उसी दुपट्टे ने इस समाज से बचा लिया। की फिर झूलती मिलती है वो लिए संग अपने, वही वादे, वही कसमें, वही एक आखिरी दुपट्टा बंधे उसके गले से, और उन बुझ चुके मोमबत्तियों के संग, बुझ जाते हैं, वही सपने, वही चाहत, वही ख्वाईश, वही जन्नत। हाँ, सच में आसां नहीं यूँ ही किसी का लड़की हो जाना। मगर चलो एक पल को इन सब बातों को, आओ भूल जाते हैं, की फिरसे लौट जाते हैं, उन्हीं सपनो में ख़्वाबों में, उन्हीं परियों के बागों में, जहां दिखती है फिरसे वही नादान सी मुस्कान, वही अल्हड़ सी एक लड़की, जो संग तितली के है उड़ती, वही फिर खुशनुमा चहरा, जिनपे घने जुल्फों का हो पहरा, की जहां न दर्द, न हो चीखें, की जहां न बंदिशों के घूमती दिख जाए कोई लड़की, की हो मुमकिन की वो बोल पाए, हाँ, आसां है एक लड़की होना। मगर क्या फायदा इन ख़्वाबों का, ये तो गूंगे-बहरों का समाज है, जहां चुप रहना ही धर्म है, और यहीं यहां का रिवाज़ है। जहाँ खुद चाहता हो समाज, लड़कियों के हिस्से के न्याय का खो जाना, भला वहां, आसां कहाँ होगा यूँ ही किसी का लड़की हो जाना।।