मजदूर होकर मजबूर,
चले गांव की ओर,
शहरों में नहीं रहे अब इनके ठौर।
नंगे पांव , तपती धूप,
सूखे होंठ, रोते भूखे बच्चे,
इंसानियत रो रही थी,
हैवानियत भी शर्म से लाल थी,
इतनी घिनौनी हरकत,
जरुर ये नेताओं की चाल थी।
सब चल रहे थे,
कुछ साथी छूट गए,
कुछ ट्रेनों से कटे,
कुछ गाड़ियों से रौंदे गए,
कुछ की चीख समाचारों में सुनाई दी,
कुछ शांत हो गए, बोले ही नहीं , हिले भी नहीं,
अब और नहीं , ये दुनिया भी उनकी ठौर नहीं।
वो गांव में भी मजबूर थे,
यूँ ही नहीं वो घर से दूर थे,
गांव उनका प्यारा था,
शहरों में महामारी अबकी आयी है,
गांव की भूखमरी तो सदियों से छाई है।
पिछले बरस सूखा था,
धान एक मूठ नहीं,
कई बरस तो बाढ़ रही,
घर , खेत सब डूबे रहे,
यहाँ भी तो ठौर नहीं।
गरीबी एक अभिशाप है,
गरीबों का जन्म लेना ही पाप है।
यही सूखा , यही बाढ़,
शहरों में भी तो आता होगा,
आशियाना वो ऊंचा कर के,
कृतिम शीतलता वो लेता होगा।
समाचारों में हमारी मुशिकलें देख,
फ़क द पूर्स कहता होगा,
और कुछ कविताएं भी तो लिखते होंगे,
क्षण भर की जनी वेदना को आकार दे,
कल संपादको को वो इसी वेदना को बेचता होंगें।
मज़दूर मजबूर होकर,
चले गांव की ओर,
खबर चली है चहुओर,
विगत रहे , ज्ञात रहे,
ये दुनिया ही नहीं उनकी ठौर।


