क्या करूं हाय अब तो जिया नहीं जाता है, वह ख्वाबों मैं आके नींद चुरा जाता है, कि अब तो ज़बान भी तरसने लगी है उसके बिना अब घर पर रखा बॉर्नविटा मन को संतुष्टि नहीं दे पाता है, अब तो मुझे बेकरी को घूरता हुआ वह हलवाई ही याद आता है।

मिश्री मावा तो जैसे अब आँखे चौंधिया जाता है, गुलाब जामुन के मून में मुझे अब रसगुल्ला नजर आता है, उसके साथ चमकते सितारे पेड़ों की याद दिलाते है, अब तो ग्यारह रुपयों वाले प्रसाद भी नींद में आकर चिड़ा जाता है, करारी जलेबी जैसे आज बंद चौक की याद दिलाती है, घेवर की बात तन बदन में आग लगा जाती है, कि अब तो मुझे पड़ोसी की छत पर रखी पीली गेंद भी चौघनि का लड्डू नजर आती है, और क्या कहूं बंगाली मिठाई की छवि मेरा जी बैठा जाती है, मेरा जी बैठा जाती है।