शायरी एक रात को नहीं, एक रात‌ शायरी हो गई,

करने ते मैं पढ़ाई बैठा था मगर लम्हे से यारी हो गई।


वो घंटा तो बर्बाद हो गया खुद के दीदार में मगर अच्छा हुआ खुद से दो बात हो गई।

बेहतर पहचान लेता हूं अपने आपको अपनी रात में मैं वरना जमाने की रातों में तो गुमनामी से दोस्ती हर बार हो गई।