कभी-कभी अच्छा होता है,बस यूँ ही निकल पड़ना।
बिना किसी मंज़िल के इंतज़ार के,बस चलते रहना।
हाथों की उँगलियों से अनहद की हदों को नापना,
ज़मीन की चादर पर लेटना, आसमां की रज़ाई से झांकना।
बेफिक्र होकर बस चलते जाना,बेनाम से सफ़र पर।
या कभी यूँ ही रुक जाना,बिना किसी बात के,
और घंटो रुके रहना झील के पानी की तरह।
या झरने सा कूदना,भागना,दौड़ना,गिरना,रुकना
संभलना और थक कर ज़मीन पर लोट-पोट हो जाना।
मिट्टी में मिल जाना,पानी में कहीं खो जाना,
कभी तैरना तो कभी बस बहते जाना।
कभी-कभी अच्छा होता है, ज़ंजीरों को तोड़ना,
कभी-कभी अच्छा होता है,कुछ भी ना सोचना।
या फिर किसी गहन चिंतन में डूब जाना,
अपनी ही अलग दुनिया में कहीं खो जाना।
कभी-कभी अच्छा होता है, बस यूँ ही मुस्कुरा देना,
किसी बंद संदूक सी पुरानी बात पर ऐसे ही हंस देना।
यूँ तो लाखों उलझने हैं इस छोटी सी ज़िन्दगी में,
मगर कभी-कभी अच्छा होता है यूँ ही ज़िन्दगी को जी लेना।
