टूटा तो है,

पर अभी अंजाम बाकी है 

मेरे अरमानो को,

मुकम्मल आसमान बाकी है 

दर्द जिरह कलेश,

न जाने कितने पैगाम बाकी है 

मर्यादा की कसौटी पे,

तेरे ईमान का इम्तहान बाकी है 

तेरा तो बेगैरत था सनम,

पर मेरे इश्क का इक आखिरी मुकाम बाकी है 

तेरे दिए ज़ख्मों के,

नासूर ए निशान अभी बाकी है