सुबह और रात का सिलसिला

यह धर्मो का मसला

वोह काली रात का किस्सा

मुझको तो कुछ नहीं पता।


जिस्मों पर लगता सट्टा

अंगूर के रस का चस्का

खुद के ईमान को बेचने का हौसला

मुझको तो कुछ नहीं पता।


वोह छोटी उम्र में गले पड़ा रिश्ता

खाना देख भूखी आंखों का तरसना

मुमकिन हो जब भी खुल कर हंसना

मुझको तो कुछ नहीं पता।


हर दिन एक नई मौत मरना

अंजानो की हिफाजत में मर मिटना

उस चांद को किसी और का चेहरा समझना

मुझको तो कुछ नहीं पता।