ओस का स्नेह
ओस की प्रथम बूँद
देखो अरुणोदय के साथ
रवि की प्रथम रश्मि में
चमका वह मोती सतरंगी। १ ।
दूब के शरीर को आच्छादित कर
इठलाया वह मोती
किसी को वश में करने का जो निडर साहस है
उससे इतराया वह मोती
इसमें ताकत है एक ठोस ढ़ेले को नरम बना देने की
और हमारे पैरों तले लगकर,
हमको कुछ संकुचित कर देने की। २ ।
इनमें और वर्षा की मद्धिम बूंदों में एक अंतर है
वर्षा की बूंदो में वह अभिमान भरा होता है
और वो दूब पर रूकती नहीं,
ओस की बूंदों में वह शांत और नर्म स्नेह रहता है
जो दूब से गिरती नहीं,
इससे गिलहरी के बच्चे भी डरते हैं जानते हो क्यूँ। । ३ ।
जब वें इसको काटते हैं
तो ये ओस की बूँदे उनकी आंखों में पड़कर
कुछ डरा देती हैं उन्हें,
दूब के प्राणों की रक्षा ही नहीं वरन
उनकी अक्षुण मित्रता को निभाती हैं।४।
ये ओस की बूँदे गुलाब के नव पल्ल्वित
फूलों को अभिसिंचित भी करती हैं
और उन नवागंतुकों का स्वागत भी
और धरती को एक शीतल स्नेह देकर
गायब हो जाती है
ये ओस की बूँद ये ओस बूँद।। ५ ।।
- ऋजु मिश्र '
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