मेरे सहचर 


   मैं देख रहा हूँ

   कुछ दिनों से स्वयं को ,

   कुछ दिनों से भूल गया

   हमारी दोस्ती को,

   हाँ वही दोस्ती ,गिलहरी के बच्चों से

   वे बेचारे मेरे चॉकलेट बिस्किट को याद करते हैं। १।

     

   शायद मैं उन्हें दे पाता ,

   अब मैं बैठा रहता हूँ सीढ़ी पर

   वे आते भी नहीं देखने मुझे

   कुछ पूंछते भी नहीं ,

   अब दूब पर पड़ी ओंस से खेलकर

   चले जाते हैं बेचारे मेरे मित्र। २।

   

   मुझे भी लगता है

   और मैं कुछ शांत महसूस भी करता हूँ,

   कि मैं मित्रों के लिए कुछ डाल नहीं पाता,

   उनकी कोई तृष्णा नहीं है

   फिर भी मुझे देख आँख मटकाकर

   सरपट बेल के पेड़ पर चढ़ते हैं,

   तनिक भी रुकते नहीं ,

   और मेरी तरफ़ न आकर

   गुलाब के फूलों का आस्वाद लेते हैं।३।

    

   वे चंचल हैं और तनिक शांत भी

   मैंने कहा कल से हाँ कल से,

   हमारी मित्रता अविराम चलेगी ,

   वे भाग कर मेरे पास आते हैं

   और कहते हैं ,तो फिर चॉकलेटी बिस्किट। ४।

     

    मैंने कहा क्यों नहीं

    तुम सब ही तो मेरे प्राकृतिक सहचर हो

    जो मुझे नैसर्गिक नवीन और असीम

    आनंद देते हो,

    तुम ही तो हो जो सितार की धुन के साथ

    मंद -२ नृत्य करते हो मेरे सामने

    तुम ही तो हो मेरे मन कि

    सारी व्यथा सुनते हो

    हृदय की संवेदना को परिष्कृत कर

     अक्षुण्ण  स्नेह देते हो।। ५। ।

                           

                        -ऋजु मिश्र

 

 https://rijubhu.blogspot.com/2018/01/mere-sahchar.html