*वेदना के स्वर*
*विरह की यादों की झुरमुट में, मैं प्रेम पंख समेटे बैठी, मुझमें जर्जर हुई सीलन की खुशबू, मैं दफ़न हुई गीली मिट्टी में।*
सुन सको तो सुनो कभी
ये वेदना के स्वर!
बिलखती हुई सी आहें
दर्द हिसाब माँगता है!
सदियों से जर्जर सी
दीवारों की सीलन में!
इश्क़ दफ़न हुआ सा
तू देख न सका, क्यूँ!
कभी गुजरो अंधेरे में
जरा कदम संभाल रखना!
उस गीली मिट्टी में
हम भी दफ़न हुये है!
तू रहा नहीं कहीं पर
तेरे निशान अब भी बाकी है!
मेरी रूह अब भी मचलती
यादों के कदम रखती!
फिर करती है कोशिश
तुझ तक पहुँचाने की!
सुन सको तो सुनो कभी
ये वेदना के स्वर!
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