पिता
पिता शब्द का स्मरण
कुछ लेट ही याद आता ।
माँ की ममता में शायद
यह शब्द धूमिल पर जाता।
मैं लिखने की कोशिश करती
शब्द मगर सब धूल जाते।
इस प्रेम को परिभाषित कर
कलम भी मुश्किल में आती।
चिंताए सारी हर ली हमारी
हम जान भी यह नहीं पाते।
अपनी पीड़ा हर बार छुपाई
हम जी भर कर मुस्कुराते।
जब हम संघर्ष रथ पर खड़े
बोले जीवन पथ अब उठा ले।
मेरे सर पर हाथ है उनका
सारी विपदा हर लेने को।
मैं कई बार तो लड़ जाती
फिर जी भर लाड़ लगाती।
पिता शब्द स्मरण करते ही
मैं जीवंत सी फिर मुस्काती।


