क्यों दूँ मैं स्पष्टीकरण
मैं समग्र हूँ, पूर्ण हूँ, मुखर हूँ
मेरा शोषण करके
क्या समझा है तुमने
तुम विजयी हो।
ओ पुरूष....
तुम्हारी मानसिकता
इतनी विकृत हो गई है
क्या तुम्हें किंचित भी आभास है
तुम कितने भयभीत हो
तुमने इतिहास को पढ़ा तो
पर शायद तुम्हें यह भान नहीं।
तुमने उस नायिका का
प्रेम तो देखा
रोम रोम जो तुममें
रंग कर तुम्हें
रति-कामिनी सा सुख देती है।
कभी उस वीरांगना को भी देखो
जो रण में रणचंडी सा
तांडव भी रच जाती हैं।
कभी जौहर की अभिलाषा
जो आत्मसमर्पण से पहले
खुद का प्रचंड रूप
अग्नि में धर जाती है।
अग्निपरीक्षा देने का सामर्थ्य
क्या तुममें है?
जिन छिछली अधिकारों का बोझ मेरे
माथे मढ़ कर खुश हो
उन का बोझ मैं ढोती हूँ।
क्यों तुम भूले मैं चुप हूँ
पर मैं आश्रित नहीं
दायित्व सौंपा जो विधि ने
न निभाऊं तो
तेरा अस्तित्व नहीं।
कहो, लेखक
क्यों दूँ मैं स्पष्टीकरण
जब ज्ञात है मुझे कि
मैं समग्र हूँ, पूर्ण हूँ, मुखर हूँ।
#रश्मि
वडोदरा
