तेरा इश्क़ का यूं गुमान सा रहा,
मेरा नाम कहाँ फ़क़त नाम सा रहा!
ढलने लगा जहाँ भर का शोर मुझमे,
तेरी गलियों में कुछ इस तरह बदनाम सा रहा!
मुझे याद है अब तलक उन होटो की थिरकन,
बाद उसके हर पहर इनाम सा रहा!
वो हरकत आज भी इन लवो पे ठहरी है,
एक लम्हा खुद में यूँ तमाम सा रहा!
-Richa Pathak


