शोर हो तुम मेरे ज़हन का,
और सुकून हर धड़कन सा ,
ना होकर भी बिखरे हो मुझमें,
मुकाम जैसे दीवानेपन का ।
जब्त इस कदर ये बेचैन साँसे,
है क्या असर, तेरी छुअन का ।
एहसासो को अपने अब लफ़्ज़ दे दो,
हासिल मिले कुछ इस उलझन का ।
शोर हो तुम मेरे ज़हन का,
और सुकून हर धड़कन सा ,
ना होकर भी बिखरे हो मुझमें,
मुकाम जैसे दीवानेपन का ।
जब्त इस कदर ये बेचैन साँसे,
है क्या असर, तेरी छुअन का ।
एहसासो को अपने अब लफ़्ज़ दे दो,
हासिल मिले कुछ इस उलझन का ।