शोर हो तुम मेरे ज़हन का,

और सुकून हर धड़कन सा ,


ना होकर भी बिखरे हो मुझमें,

मुकाम जैसे दीवानेपन का ।


जब्त इस कदर ये बेचैन साँसे,

है क्या असर, तेरी छुअन का ।


एहसासो को अपने अब लफ़्ज़ दे दो,

हासिल मिले कुछ इस उलझन का ।