अगर है ख़्वाहिश !


तो नैनों में अश्क नहीं, अंगारे लिए चल,

राह में जो आये रोड़ें, उन्हें किनारें किये चल,

क्या हुआ जो मंज़िल दूर है अभी,


तू ठान ले ! 

जिन्होंने ना हो मानी हार कभी, 

देतें हैं उन्ही की मिसाल सभी।


इसलिए उठ ! 

मिटा सारे अंतर्द्वंद अपने,

लेकर मशाल हिम्मत की,

सच कर दे अपने सपने।

संघर्ष का मैदान है ये,

है ये एक अनदेखी स्पर्धा,

तू इसे जीत जाएगा,

जो केवल खुद को अपना पायेगा।


तू डर मत !

तुझ जैसे उगते सूर्य को सभी करेंगे प्रणाम,

जब देखेंगे तेरी सफलताओं के नये आयाम।


इसलिए तू बस चल ! 

-ऋचा-